सैंजी बर्सात पाछ: पैतृक पहाड़ माथै दू इंद्रधनुष

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रमेश चंद्र खंकरियाल

एम.ए., बी.एड.

कभि-कभि प्रकृति खाली अपणो रूप नी दिखांदी—उ त अपणी गोद म दबी पुराणी यादां भी उघाड़ देंदि।

आज, पौड़ी गढ़वाल का थलीसैंण तहसील म बस्याण हमरौ पैतृक गौं सैंजी, बर्सात स्यूँ न्हायो-पखार्यो खड़ो छ, अर प्रकृति नै ऐसौ नजाऱो सजायो छ जौं जिंदगी भर आँखां म बस्यो रैजाला।

बर्सात नै डाँड-पाख धौळि द्याछ।

धुंध धीरे-धीरे डाँडां की धार म सरकि रै छ।

सीढ़ीदार खेत घणा हर्या-भऱ्या छन—जैं धरती नै हरै रंग की नई चादर ओढ़ ली हो।

सैंजी का पुराणा अर नौंण घर, कखि ढुंग-पत्थर अर लकड़ी का, कखि ईंट-सीमेंट का, डाँड की ढलान म इधर-उधर ऐसां दिखंदण जैं पुरख्यां की याद का टुकड़ा पहाड़ म अटक्या होय।

यो छ बर्सात का सैंजी—ताजौ, भीज्यो, हरौ-भरौ अर मन नै मोह लेण वालौ।

लागद छ जैं डाँड-पाख खुद सांस लेंदण।

बादळ घाटी म उतरि ऐंदण। कभि पूरा डाँड ढाँपि देंदण, अर कभि अचानक पाछ हटि जांदण—अर तखि पहाड़ ऐसां उघड़द जैं कोई परदा सरक ग्यौ होय।

कैमरा जख गौं माथै घूमद छ, तखि सैंजी का घरा-द्वार दिखाई देंदण।

कखि घर म आज भी चूल्हो-चौको जलद छ, कखि घर बंद छन; घर का मनख शहरां म बसि ग्याछन, अर कखि त परदेस का दूर देशां तक जा बस्याण।

पर घर ठाढ़ छन।

जमीन ठाढ़ छ।

सीढ़ीदार खेत आज भी छन।

अर इन सब स्यूं बड़ी चीज—गौं स्यूं मनख का नातो आज भी जिंदा छ।

जौं मनख रोजी-रोटी खातर शहरां म, देश का अलग-अलग कोनां म, या परदेस म जा बस्याण, उनकुं खातर पैतृक घर खाली ढुंग, लकड़ी, ईंट अर गारे की इमारत नी होन्द।

उ त यादां को घर होन्द।

उ घरां म बाज्यू-ब्वारी का पगां की आहट बसि रैंदि।

बचपन का हंसण-बोलण बसि रैंद।

तिहार-बार, पूजा-पाठ, ब्याह-सगाई, खेत-बारी, फसल कटण, बर्सात की रात अर अंगीठी कने बैठिकै सुनाई गेणी पुराणी बातां—सब उ घरां की भीतरी सांस म बस्या रैंद।

इसी खातर कैमरा खाली घर नी दिखांद।

उ अपणापन दिखांद।

उ जड़ दिखांद।

उ मनख अर माटी का बीच को उ नातो दिखांद जौं दूरी स्यूं भी टूटद नी।

अर बर्सात त अपणो रंग लैकै आई छ।

बारी-बौण, खेत-बारी सब जण हरियाळी स्यूं भरि ग्याछन।

कद्दू अर लौकी की बेलीं बाड़ां माथै चढ़ि ग्याछन। कखि धरती माथै पसरी छन, कखि छप्पर अर टाटी पकड़ि कै ऊपर चढ़दी जांदण।

बर्सात पहाड़ खातर खाली पानी बरसण को मौसम नी छ।

यो जागण-जीवण को मौसम छ।

सूखी माटी पानी पींदि छ।

सीढ़ीदार खेत फेर हरै हो जांदण।

बेल-पात चारों कुंण फूटि पड़दण।

बौण, बारी, खेत अर बाट—सब म जैं नवीं जान पड़ जांदी।

पूरौ गौं अर आस-पास का डाँड-पाख एक जिंदा चित्र जैं लागद—एक तरफ खेत, दूसरी तरफ बौण, बीच म घर-द्वार अर चारों कुंण हिमालय की धरती।

अर तभी, सैंजी का धुंधळ्या डाँडां का माथै आकाश म एक अद्भुत नजाऱो उभरि आयो।

इंद्रधनुष।

अर उसकै पाछुं—विश्वास करणा भी कठिन—दूसरौ इंद्रधनुष।

एक साथ दू-दू इंद्रधनुष!

सैंजी का आकाश म।

पैतृक गौं का माथै।

दृश्य ऐसौ कि आँखां ठहरि जांदण।

लागद जैं आकाश नै आज गौं खातर कोई खास रंगोली सजाई होय।

पर यो खाली जादू नी छ।

इसका पाछुं विज्ञान को एक बड़ौ सुंदर राज छ।

जख सूरज की किरण बर्सात की नन्हीं-नन्हीं पानी की बूंदां म पड़द, तखि रोशनी बूंद म घुसद बखत मुड़द। बूंद का भीतर जाकै रोशनी एक बार टकरैकै पाछि परावर्तित होन्दि अर फेर बाहर निकलद बखत एक बार अर मुड़द।

सूरज की सफेद रोशनी असल म अलग-अलग रंगां स्यूं मिलिकै बनी छ।

पानी की बूंदां इन रंगां नै अलग-अलग ढंग स्यूं मोड़दण।

तभी लाल, नारंगी, पीळो, हरौ, नीलौ अर बैंगणी रंग आकाश म कमान बणाइकै दिखाई देंदण।

यानी इंद्रधनुष असल म धूप अर बर्सात का मिलण स्यूं बण्या रंगां को खेल छ।

अर दूसरौ इंद्रधनुष?

उ भी सच छ—आँखां को भरम नी।

कखि-कखि सूरज की किरण पानी की बूंद का भीतर दुई बार परावर्तित होन्दि। इसी दूजी परछाईं स्यूं दूसरौ इंद्रधनुष बणद—बड़ौ, बाहर की तरफ अर आम तौर म पहिलै स्यूं हल्कौ।

अर एक बात अर बड़ी रोचक छ।

दूनूं इंद्रधनुषां म रंगां को क्रम एक जैं नी होन्द।

पहिलै इंद्रधनुष म लाल रंग बाहर की तरफ अर बैंगणी भीतर की तरफ होन्द।

दूसरै म रंगां को क्रम उल्टौ पड़ जांद।

दूनूं कमानां का बीच आकाश को एक गाढ़ौ-सा अंध्यारौ पट्टी दिखद। वैज्ञानिक लोग इसै अलेक्जेंडर बैंड कहंदण।

जौं चीज आँखां नै जादू लागद, उ असल म सूरज, पानी की बूंद, रोशनी की चाल, आकाश की स्थिति अर देखण वालै मनख का बीच को अद्भुत मेल छ।

इंद्रधनुष देखिकै मन म सवाल उठद—अब भोल मौसम कैसो होल?

पर इंद्रधनुष खुद यो नी बतौंद कि भोल धूप पड़ली या बर्सात होली।

उ बस इत्तु जरूर बतौंद कि उस बखत आकाश का एक तरफ सूरज की धूप छ अर दूसरै तरफ पानी की बूंदां छन।

इसी खातर बर्सात का बीच या बर्सात पाछ इंद्रधनुष खूब दिखाई देंद।

बादळां म जख धूप की एक खिड़की खुल जांदी अर उ धूप गिरदि बर्सात की बूंदां माथै पड़दी, तखि आकाश म रंगां की कमान खिंच जांदी।

आज भी थलीसैंण इलाकै म बर्सात को दौर चलद रैण की संभावना छ।

इसलिये आज को इंद्रधनुष यो नी कहंद कि भोल गौं म धूप ही धूप होली।

उ त खाली इत्तु कहंद—

आज सैंजी माथै धूप अर बर्सात की भेंट होई।

अर उ भेंट की निशानी म आकाश नै इंद्रधनुष दे द्यौ।

इन तस्वीरां नै गौर स्यूं देखौ।

यो खाली पहाड़ का नजाऱा नी छ।

यो जिय्या-जागत्या जीवन को नजाऱा छ।

हर सीढ़ीदार खेत म मेहनत छ।

हर खेत म पसीना छ।

हर घर म एक परिवार की कहानी छ।

हर बाट म पुरख्यां का पगां की आहट छ।

अर हर धार म उ मनखां की याद छ जौं आज गौं स्यूं दूर शहरां अर परदेसां म रहंदण।

सैंजी इसलिये खाली बसण को गौं नी।

यो खेती को गौं छ।

यो यादां को गौं छ।

यो अपणी जड़ां को गौं छ।

बर्सात इस नातै नै अर गाढ़ौ कर देंदि।

पानी खेतां नै पन्ना जैं हरौ कर देंद।

बादळ डाँडां नै नरम कर देंदण।

धुंध गौं नै सपनै जैं बना देंदि।

अर ढळदि धूप म साँझ का रंग पूरै गौं नै जैं चल्दे-फिरदे चित्र म बदल देंद।

पर इस सुंदरता का पाछुं पहाड़ी जीवन की अपणी सच्चाई भी छ।

आज सैंजी म बिजली भी बंद छ।

गौं का मनख खातर बिजली जाण खाली छोटी परेशानी नी छ।

रात की रोशनी, खाना पकाण, पानी गरम करणा अर दूसरी जरूरी जरूरतां खातर अलग इंतजाम करणा पड़द।

पहाड़ म रहण वालै मनख मौसम, डाँड-पाख अर सुविधां की अनिश्चितता स्यूं जीण की आदत डालि लेंदण।

शायद इन तस्वीरां म यो भी एक बात छिपी छ—

पहाड़ सुंदर घणा छन, पर पहाड़ म जीण खातर हिम्मत, मेहनत, समझदारी अर आपणा भरोसा भी जरूरी छ।

अर अब साँझ धीरे-धीरे सैंजी माथै उतरि रै छ।

डाँड-पाख फेर धुंध म लुकण लग ग्याछन।

खेत हरै छन।

घर चुपचाप ठाढ़ छन।

बर्सात धरती स्यूं अपणी सदियां पुराणी बात करदि रै छ।

अर घाटी का माथै थोड़ी देर खातर दू चमकती कमान आकाश नै धरती स्यूं जोड़ि रै छन।

दू इंद्रधनुष।

दू रंगीन कमान।

दू रोशनी का पुल।

मानौं धरती अर आकाश का बीच कोई डोर बंधि गेई होय।

मानौं बीती पीढ़ी अर आज का बीच कोई नातो जुड़ि ग्यौ होय।

मानौं सैंजी अर दूर परदेस म बस्या मनख का बीच कोई अदृश्य बाट खुलि गेई होय।

सैंजी स्यूं जुड़्या मनख खातर यो खाली सुंदर नजाऱो नी।

यो एक याद छ—

मनख जत्तौ भी दूर निकलि जाओ, कुछ माटी ऐसि होन्दि जौं मनख नै बार-बार अपणी तरफ बुलांदी रैंदि।

सैंजी आज भी वहीं छ—

अपणा डाँड-पाख म,

अपणा खेत-बारी म,

अपणा पैतृक घर-द्वार म,

अपणा बर्साती बादळां म,

अर आज—

अपणी पूरी छटा स्यूं,

दू इंद्रधनुषां म।

सैंजी—जख डाँड-पाख पुरख्यां की याद संभाळिकै रखदण, बर्सात माटी म नवीं जान भरदि, अर कखि-कखि आकाश खुद गौं माथै रंगां की कमान धरि कै आशीष दे जांद।

हिमालयन लाइव ब्यूरो